यह कहानी साशा की है, जिसका जन्म शहर के भीड़ के बीच में हुआ था। उसके पिताजी ने उसके पैदा होने की खुशी में, ठीक उसी दिन, घर के आँगन के एक कोने में एक छोटा-सा अमरूद का पौधा लगाया था।
साशा ने उसका नाम फ़िद रखा।
“पिताजी ने साशा से कहा, ‘बेटा, जैसे-जैसे तुम बड़े होगे, यह पेड़ भी बड़ा होगा। तुम्हारी उम्र और इस पेड़ की उम्र हमेशा साथ रहेगी।”

साशा बचपन से ही उस पेड़(फ़िद) को अपना सबसे अच्छा दोस्त मानता था। वह रोज सुबह उठकर सबसे पहले उस पेड़ को देखता, उसे पानी देता और घंटों उसकी छाँव में खेलता। जब भी साशा स्कूल से घर आता पेड़ पर चढ़ जाता और अमरूद तोड़ खाता और घंटों फ़िद से बातें किया करता। मम्मी चिल्लाती की पहलें कुछ खा लो फिर खेलना, लेकिन साशा फ़िद के साथ खेलने उससे बातें करने में ही मगन रहता था।
साशा के लिए फ़िद सिर्फ एक पेड़ नहीं था, वह साशा के बचपन का साथी था। उसकी हर खुशी, हर दुख, हर तनाव सब उस पेड़ के साथ बँधा था।
समय बीतता गया, साशा स्कूल से अब कॉलेज में चला गया। साशा का कॉलेज घर से दूर था, लेकिन अक्सर साशा छुट्टी में घर आता और वह सबसे पहले अपने ‘दोस्त’ फ़िद से मिलने जाता और घंटों फ़िद से बातें करता, और मिठे-मिठे अमरूद का स्वाद लेकर खाता।
फ़िद की सबसे ख़ास बात यह था कि वह साल में दो बार फल देता और हर सीजन में फ़िद अमरूदों से लदा रहता था। फ़िद घना और बड़ा हो जाने के कारण इसमें अमरूद ज्यादा लगते थे, जो समय के साथ औऱ भी स्वादिष्ट, मिठा लगने लगा था।
एक बार जब साशा छुट्टियों में घर आया, तो उसने देखा कि घर के निर्माण का कार्य चल रहा था, जिसमें फ़िद के काटें जाने का प्रबल सम्भावना था। साशा ने अपने पिता से फ़िद के न काटने की बात रखी। पिता जी ने साशा के शब्दों में फ़िद के लिए गहरा भावनात्मक जुड़ाव को देखकर फ़िद के काटने का फैसला बदल दिया।
साशा का नौकरी दिल्ली लग जाने के कारण उसका घर आना जाना अब कम हो गया था। कामों मे व्यस्त हो जाने के कारण साशा का घर आना जाना कम हो गया था। होली, दिवाली, ईद सब उसका अब ऑफिस में ही बितता था। समय बीतता गया साशा के भाईयों के शादी हो गये परिवार बड़ने के साथ घर को भी विस्तार करने का डिमान्ड था।
आज कई दिनों के बाद जब साशा अपने घर पहुँचा तो देखा जहाँ अमरूद का पेड़ था अब वहा कमरा बन गया था। यह देख कर साशा का फ़िद के लिए भावनात्मक लगाव पर गहरा ठेस पहुँचा। लेकिन अब घर पर भाईयों के शादी हो गये थे परिवार बड़ता जा रहा था इस परिस्थिती में कमरों का बनाना स्वभाविक था इसके लिए फ़िद का काटा जाना भी अनिवार्य हो गया था क्योंकि शहरों में इतना कम जगह होता है कि वहां घर में पेड़ लगाना मुस्किल था इस दुविधा के आगे साशा कुछ कर भी नहीं सकता था।
लेकिन आज भी, जब साशा अपने घर जाता है, तो फ़िद के जगह पर बनें कमरें को देखकर उसे अपने बचपन की यादें ताज़ा हो जाती हैं। फ़िद और साशा का यह रिश्ता, जन्म से जुड़ा हुआ, केवल हरियाली का नहीं, बल्कि प्यार, यादों और गहरे भावनात्मक लगाव का प्रतीक था।
साशा ने फ़िद के लिए अपने दिल में खाली पन को पूरा करनें के लिए कई पौधे घर में लगाये अमरूद के भी बौंजाई पेड़ लगायें लेकिन इसमें फ़िद जैसै न ही स्वाद था न फ़िद जैसा लगाव बन पाया।
