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साक्षात्कार एक पहेली

फ़िद –  साशा कितने बजे है।

साशा – अभी तो सुबह के 07:00 बज रहे है।

फ़िद – आज तो तुम्हारा हिन्दी के Assistant Proffesor पद के लिए Interview है ना।

साशा – है तो, लेकिन मैं Interview देने नहीं जा रहा।

फ़िद – अरे! साशा ऐसा क्यों? तुम तो इतने गुणी हो हिंदी में तुम्हे महारथ हासिल है। तुम Interview दो तुम्हारा चयन जरूर होगा।

साशा – क्या क्यों! तुम जानते हो पूरे विश्वविद्यालय में हिंदी Assistant Proffesor पद के लिए बस 01 पद का चयन होना है और देश भर से 100  से ज्यादा आवेदक Interview  देने आ रहे है।

फ़िद – अरे! तुम इतना क्यों सोचते हो। तुम Interview पर बस ध्यान दो।

साशा – अरे! तुम मेरी पूरी बात तो सुनो।

फ़िद – हॉ हॉ बताओं।

साशा – मैं तो पूरी तरह से Interview  के लिए तैयार हूँ। मेरी तैयारी भी सम्भवतः  औरों से बेहतर है क्यों कि मै निरंतर पठन पाठन का कार्य करता रहा हूँ और अपने गॉव के लोगों को निशुल्क हिन्दी विषय पर शिक्षा देता रहा हूँ।

लेकिन फ़िद क्या तुम्हें नहीं लगता पग-पग पर राजनीति, जातवाद, क्षेत्रवाद करने वाले कुंठित विचार रखनें वाले ये बड़े-बड़े पदों पर आसित लोग विश्वविद्यालय के वो 01 पद के लिए किसी पहचान वाले का पहले से हि चयन नहीं कर लियें होंगें।

ये Interview  तो ठोंग है लोगों को दिखाने के लिए कि वे पारदर्शिता कर रहें है असल में तो चयन प्रक्रिया कब का हो चुका है।

फ़िद – मौन होकर सुनता रहा। कहने को तो बहुँत कुछ था लेकिन उसके कण्ठ सुख गये थे, सामाज के इस व्यवस्था मे वो खुद को मौन रखना ही बेहतर समझा।

साशा – आखों में उम्मीदों का बूँद लिये, एकटक फ़िद को बस निहारता रहा।

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