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पराक्रम दिवस

नेताजी सुभाष चंद्र बोस

पराक्रम दिवस भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती के उपलक्ष्य में हर साल 23 जनवरी को मनाया जाता है।

कब हुई पराक्रम दिवस की शुरुआत

पराक्रम दिवस मनाने की घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा जनवरी, 2021 में की गई थी। उस समय 23 जनवरी को नेताजी की 124वीं जयंती पर पहला पराक्रम दिवस मनाया गया था। यह दिवस स्वतंत्रता आंदोलन में नेताजी द्वारा किए गए उनके अथक प्रयासों का प्रतीक है।

इसका मुख्य उद्देश्य लोगों में देशभक्ति की भावना, साहस और दृढ़ संकल्प को बढ़ाना है।

 साल 2026 में नेताजी की 129वीं जयंती मनाई जा रही है। इस अवसर पर संस्कृति मंत्रालय द्वारा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (श्री विजया पुरम) और देश के अन्य 13 प्रमुख स्थानों पर भव्य कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। 

 
 
नेताजी सुभाष चंद्र बोस (1897-1945) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रखर और प्रभावशाली नेताओं में से एक थे।

उनके बारे में सम्पूर्ण जानकारी निम्नलिखित है:

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा जन्म: 23 जनवरी 1897 को ओडिशा के कटक शहर में।
परिवार: उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस (एक प्रसिद्ध वकील) और माता का नाम प्रभावती देवी था। वे अपने माता-पिता की 14 संतानों में 9वीं संतान थे।
शिक्षा: उन्होंने कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से बीए (दर्शनशास्त्र) किया। इसके बाद, 1920 में उन्होंने इंग्लैंड में प्रतिष्ठित भारतीय सिविल सेवा (ICS) परीक्षा उत्तीर्ण की, लेकिन देश की सेवा के लिए उन्होंने इस पद से त्यागपत्र दे दिया।

राजनीतिक यात्रा
राजनीतिक गुरु: उन्होंने चित्तरंजन दास को अपना राजनीतिक गुरु माना।
कांग्रेस में भूमिका: वे 1938 (हरिपुरा) और 1939 (त्रिपुरी) में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। हालांकि, महात्मा गांधी के साथ वैचारिक मतभेदों के कारण उन्होंने 1939 में इस्तीफा दे दिया और 'फॉरवर्ड ब्लॉक' नामक अपनी अलग पार्टी बनाई।

सुभाष चंद्र बोस का स्वतंत्रता संघर्ष मुख्य रूप से 'पूर्ण स्वराज' के लक्ष्य और ब्रिटिश शासन के खिलाफ 'सशस्त्र क्रांति' पर आधारित था। उनकी क्रांतियों और प्रमुख आंदोलनों का विस्तृत विवरण निम्नलिखित है:-
1. असहयोग आंदोलन और शुरुआती संघर्ष (1921) 
  • प्रारंभ: नेताजी ने अपनी राजनीतिक यात्रा 1921 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से शुरू की।
  • गिरफ्तारी: क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण उन्हें पहली बार 1921 में 6 महीने के लिए जेल भेजा गया। अपने जीवनकाल में वे कुल 11 बार जेल गए। 
 
2. फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना (1939) 
  • उद्देश्य: महात्मा गांधी और कांग्रेस के अन्य सदस्यों के साथ वैचारिक मतभेदों के कारण उन्होंने 1939 में कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और कांग्रेस के भीतर ही ‘ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक’ का गठन किया।
  • रणनीति: इस दल का लक्ष्य ब्रिटिश शासन के खिलाफ अधिक आक्रामक और क्रांतिकारी रुख अपनाना था। 
3. ‘महान निष्क्रमण’ (Great Escape, 1941)
  • नजरबंदी से पलायन: 1941 में जब अंग्रेजों ने उन्हें कलकत्ता में उनके घर पर नजरबंद कर दिया था, तब वे वेश बदलकर (मौलवी जियाउद्दीन के नाम से) वहां से भाग निकले।
  • अंतरराष्ट्रीय यात्रा: वे अफगानिस्तान और सोवियत संघ होते हुए जर्मनी पहुंचे, ताकि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारत की स्वतंत्रता के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटा सकें। 
 
4. आजाद हिंद फौज (INA) का पुनर्गठन (1943) 
  • सशस्त्र संघर्ष: सिंगापुर में उन्होंने रास बिहारी बोस से ‘आजाद हिंद फौज’ की कमान संभाली और इसका पुनर्गठन किया।
  • महिला रेजिमेंट: उन्होंने महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए ‘रानी झांसी रेजिमेंट’ का गठन किया, जो उस समय के लिए एक क्रांतिकारी कदम था।
  • नारे: इसी दौरान उन्होंने “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” और “दिल्ली चलो” जैसे क्रांतिकारी नारे दिए। 
 
5. आजाद हिंद सरकार का गठन (1943) 
  • समानांतर सरकार: 21 अक्टूबर 1943 को उन्होंने सिंगापुर में ‘आजाद हिंद सरकार’ (Provisional Government of Free India) की स्थापना की, जिसे जापान और जर्मनी सहित कई देशों ने मान्यता दी थी।
  • क्षेत्रीय विजय: उनकी सेना ने अंडमान और निकोबार द्वीपों को मुक्त कराया और उनका नाम बदलकर क्रमशः ‘शहीद’ और ‘स्वराज’ द्वीप रखा। 
 
6. इम्फाल और कोहिमा का अभियान (1944) 
  • भारत पर आक्रमण: INA ने जापानी सेना के सहयोग से भारत की उत्तर-पूर्वी सीमा (बर्मा के रास्ते) से प्रवेश किया और इम्फाल व कोहिमा में अंग्रेजों के खिलाफ भीषण युद्ध लड़ा। 
नेताजी का मानना था कि अहिंसा के साथ-साथ आवश्यकता पड़ने पर सशस्त्र बल का प्रयोग भी स्वतंत्रता के लिए अनिवार्य है। उनके इन क्रांतिकारी कदमों ने भारतीय सेना के भीतर विद्रोह की भावना पैदा की, जो अंततः अंग्रेजों के भारत छोड़ने का एक बड़ा कारण बना।

नेताजी उपाधि कब और कैसे मिला

सुभाष चंद्र बोस को ‘नेताजी’ की उपाधि सबसे पहले 1942 में जर्मनी में मिली थी। इसके बारे में मुख्य तथ्य निम्नलिखित हैं: 
  • किसने दी: यह उपाधि मुख्य रूप से जर्मनी के ‘स्पेशल ब्यूरो फॉर इंडिया’ के भारतीय और जर्मन अधिकारियों तथा ‘आजाद हिंद फौज’ (Indische Legion) के भारतीय सैनिकों द्वारा दी गई थी। कुछ ऐतिहासिक संदर्भों में यह भी उल्लेख मिलता है कि जर्मन तानाशाह एडोल्फ हिटलर ने उन्हें पहली बार ‘नेताजी’ कहकर संबोधित किया था।
  • कब दी: यह सम्मान उन्हें 1942 की शुरुआत में दिया गया था जब वे भारत की स्वतंत्रता के लिए समर्थन जुटाने बर्लिन (जर्मनी) में थे। 
अन्य महत्वपूर्ण उपाधियाँ:-
  • देशनायक: सुभाष चंद्र बोस को रवींद्रनाथ टैगोर ने ‘देशनायक’ की उपाधि दी थी।
रहस्यमयी मृत्यु
आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, 18 अगस्त 1945 को ताइवान (ताइपेई) में एक विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई थी। हालांकि, उनकी मृत्यु की परिस्थितियों को लेकर आज भी कई रहस्य और विवाद बने हुए हैं। 
 
विरासत (2026 तक)
  • भारत सरकार हर साल 23 जनवरी को उनकी जयंती को पराक्रम दिवस के रूप में मनाती है।
  • अंडमान की राजधानी पोर्ट ब्लेयर का नाम बदलकर श्री विजया पुरम कर दिया गया है, जो उनके विजय अभियान का प्रतीक है।

1 thought on “पराक्रम दिवस”

  1. Bht khoob, apk is post se bht knowledge hui aur pichhla pada hua sb recall bhi ho gya…
    Keep it up, ek din aap achhe writer k roop me jane jayenge

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