अनोख़ा पिता

आज शाम मैं घर से निकला और शहर के मिठे-मिठे शर्द के मिजाज का आनंद लेते हुए, चाँद से सजे मनमोहक शहर की खुबशूरती में ओत-प्रोत था। अचानक मेरी नजर भीड़ पर पढ़ी जो किसी एक जगह एक-टक निगाहें लिए निहार रही थी। मेरी भी जिज्ञाषा हुई उस भीड़ की नजरों को देखने की।
मैने अपनी साईकिल भीड़ की तरफ मोड़ ली और जा कर देखा तो एक आदमी साधारण सा करतब दिखा रहा था।

जमीन पर कुछ खिलौने पड़े थे, जो कोई रिंग को किसी भी खिलौने में फेक देता वो खिलौना जीत कर ले जाता। कुंठित मन में मैं सोचता जा रहा था कि बेवकूफ बना के पैंसे कमा रहा है भला कौन इतना दूर रखे खिलौने पर रिंग जा मारेगा ये सब आज कल कमाने का नया - नया तरीका निकाल लिए है। मेरे मन की भीड़ को देखने की सारी जिज्ञाषा जैसे धुमिल सी हो गयी मेरे मन में ख्याल आया कहां शहर के खुबसुरती को छोड़ ये तमाशा देखने आ गया। मैं अपनी साईकिल भीड़ से शहर की ओर मोड़ ही रहा था कि मेरी नज़र एक बच्ची पर पड़ी जो दो साल की लग रही थी।
इस हल्की-फुल्की ठंड में मै जहां अच्छा-खासा स्वेटर पहना हूँ वो पतला सा कपड़ा पहने हुए थी, और एक लड़का जिसकी उम्र चौदह साल की होगी अपनी हरकतों से मानसिक रूप से विकृत लग रहा था, अपनी धुन में मस्त बच्ची के साथ खेल रहा था। जरूर ही ये दोनो उस सर्कस वाले के बच्चें होंगे।
मेरे मन में बच्चों के प्रति दया कि भावना जागृत होने लगी और मेरी साईकिल मुझे कही भी जाने कि इजाजत नहीं दे रही थी।
बहरहाल अब अंधेरा हो चला था भीड़ भी अब अपने गंतव्य के तरफ चल दी थी, और सर्कस वाला अपनी दुकान समेटने लगा था। मेरे चंचल मन ने सोचा कि चलो थोड़ा इनको पैंसे से मदद कर दे कि लहजे से सर्कस वाले से बात करने की चाह रखी।
मैनें पुछा…
और चाचा कितना कमा लेत होबा इह गुड्डन के खेला में।
चाचा मुझे देख कर थोड़ा मुस्कुराये और बोले…
हो जाला दिन गुजर।
मैने बात बढ़ाते हुए आगे बोला…
इह ठंडवा में बच्चनवन के लेके यही खुलवें मे रहला का।
बेचारा बाप संकोच सा शब्द में बोला…
हा....
अभी तो मै अपने गांव से इस शहर के चकाचौध मे आया हू वहां दिन गुजर जाये जितना भी कमाई नहीं हो पा रहा था कुछ दिनों में जरूर ही ठंड की कोई ना कोई व्यवस्था कर लूंगा।
हमारी बातें ठेठ भाषा से संवेदनशील भाषा में बदलते जा रही थी।
बात करते हुए अब काफी देर हो गयी थी, मै भी सरकस वाले को अपना समझ उससे बातें कर रहा था।
बातों-बातों में वो बोला मेरी बीबी अब इस दुनिया में नही रही, कोरोना के इस वायरस ने उसे पिछले साल ही हमसे विदा करा लिया। वो रहती थी तो मैं कमाता था और वो बच्चों को सम्भाल लेती थी। मैं जरूर ही कुछ समय में बच्चों के रहने के लिए अच्छी व्यवस्था कर लूंगा उसकी आवाज में दृढ़ संकल्प, आँखों में बच्चों के लिए ममता, साफ झलक रही थी।

मैंने कुछ पैंसे सर्कस वाले के हाथ में रखते हुए बोला...
रख लिजिए आपके काम आयेगा।
सर्कस वाले नें मुस्कुरातें हुए बोला...
नही बेटा मैं कर लूगां तुम फिकर मत करों।
उसकी बातों में गजब का स्वाभीमान था।

मैंने कहां नही नही अंकल रख लो...
सर्कस वालें ने मेरी बात काटतें हुए बोला अब शर्मिंदा कर रहें हो तुम मुझे।
इस पैंसे कि मुझे कोई जरूरत नही है, बिना मेहनत के कमाया एक भी रूपया मेरे मन को तनीक भी संतोष नही देगा।
मैं निशब्द उसको निहारता रह गया।
उसकी एक बात जो मेरे दिल में घर कर गयी थी।
वह था कि...
बेटा पैंसा तो मै कमा ही लूंगा लेकिन इतने भीड़ में तुमने रूक कर मेरा हाल जानने कि कोशिश कि, मुझसे बात करके मेरे लिए जो किया है वो किसी भी पैंसे, किसी भी उपकार से बहुत बड़ा है...
मुझे इस अनुभव का आनंद लेने दो।
जाते-जाते मेरे आँखों मे आंसू थे लेकिन ये आंसू खुशियों के थे, कई दिनों बाद आज मुझे अपनापन सा महसूस हुआ था।
अगले दिन मै नगर निगम से उनके रहने के लिए परमिशन की कॉपी और तिरपाल लेके पहुँचा।
अंकल मुझे देख आनंदित थे मैंने उनसे कहां आज मैं आपके बेटे के हैशियत से मिलने आया हूँ और ये परमिशन की आप यहा रह सकते हो, तिरपाल लगा सकते हो, कोई कुछ बोलेगां तो उसे ये परमिशन दिखा देना।
ये सब अपने भाई-बहन के लिए कर रहा हूँ इस लिए अब आप ये लेने से नही मना कर सकते है।
निष्कर्ष—
जरूरी है कि हम लोगों को देखने मात्र मे कोई अवधारणा ना बनाये, लोगों को समझने के लिए उनके पास बैठ कर उनको सुनना बहुत जरूरी है।
जरूरी नही है कि हम हर बार सामने वालें को हर एक चीज के लिए समझायें, कभी-कभी सामने वाले को केवल सुनना भी सामने वाले के दर्द में सहायक बन सकता हैं।
ये सच है कि आज के जमाने में झूठ-फरेब पग-पग पर है।
पर सच्चे लोग भी है जिसे हम सब को मिल कर अपनाना होगा।
कहने मात्र से कोई अपना नही होगा, किसी को अपना बनाने के लिए सच्चे मन से कदम बढ़ाने कि जरूरत है।
